पहली बार रणथंभौर जा रहे हैं? टाइगर सफारी, सही समय और ट्रिप प्लान की पूरी जानकारी

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  अगर आप पहली बार रणथंभौर घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो आपके मन में कई सवाल होंगे—रणथंभौर कब जाना चाहिए, कितने दिन रुकना सही रहेगा, टाइगर सफारी कैसे बुक करें, एक सफारी काफी है या दो करनी चाहिए और सबसे बड़ा सवाल, क्या रणथंभौर में बाघ जरूर दिखाई देता है? इन सवालों के जवाब जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि रणथंभौर की यात्रा किसी सामान्य sightseeing trip जैसी नहीं है। यहां आपका अनुभव मौसम, सफारी के समय, जंगल की परिस्थितियों और थोड़े से भाग्य पर भी निर्भर करता है। मेरी नजर में रणथंभौर को सिर्फ “बाघ देखने की जगह” समझना सबसे बड़ी गलती होगी। सवाई माधोपुर के पास स्थित यह इलाका जंगल, झीलों, पहाड़ियों, वन्यजीवों और ऐतिहासिक रणथंभौर किले का ऐसा मेल है, जहां एक ही यात्रा में आपको प्रकृति और इतिहास दोनों को करीब से देखने का मौका मिलता है। अगर आप अपनी पहली यात्रा को थोड़ा सोच-समझकर प्लान करते हैं, तो सिर्फ एक सफारी के बजाय पूरा रणथंभौर अनुभव करना ज्यादा यादगार हो सकता है। पहली बार रणथंभौर जाने के लिए कितने दिन काफी हैं? अगर आप पहली बार रणथंभौर जा रहे हैं, तो 2 रात और 3 दिन का trip एक अच्छा विकल्...

दिल्ली की धड़कन कनॉट प्लेस की सफ़ेद दीवारों में छिपे इतिहास, ग्लैमर


दिल्ली की तपती दोपहर हो या ठिठुरती शाम, अगर कहीं की हवाओं में एक अलग ही रफ़्तार और सुकून एक साथ मिलता है, तो वह है कनॉट प्लेस। शहर के बीचों-बीच बसा यह सफेद घेरा महज एक बाजार नहीं, बल्कि दिल्ली की रूह का वह हिस्सा है जहाँ इतिहास आधुनिकता के साथ कदमताल करता नजर आता है। जब आप राजीव चौक के मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते हैं और सामने तिरंगे को आसमान छूते देखते हैं, तो अहसास होता है कि आप किसी साधारण जगह नहीं, बल्कि राजधानी के गौरव के बीच खड़े हैं।
जॉर्जियन वास्तुकला के दोहरे स्तंभों और उन ऊँची छतों वाले गलियारों में चलते हुए ऐसा लगता है जैसे आप समय के किसी पुराने पन्ने पर चल रहे हों। यहाँ की दीवारों का सफेद रंग हर मौसम में दिल्ली की रंगीनी को खुद में समेट लेता है। एक तरफ जहाँ दुनिया भर के नामचीन ब्रांड्स के शोरूम अपनी चमक बिखेरते हैं, वहीं दूसरी तरफ जनपथ की गलियों में मिलने वाले झुमके और हस्तशिल्प की वस्तुएं यहाँ की संस्कृति में देसी तड़का लगाती हैं।
कनॉट प्लेस का असली जादू इसके दो चेहरों में छिपा है। दिन के समय यहाँ दफ्तरों की भागदौड़ और फाइलों का बोझ दिखता है, लेकिन जैसे-जैसे सूरज ढलता है, CP अपना मिजाज बदल लेता है। सेंट्रल पार्क के लॉन में बैठकर दोस्तों के साथ की गई गपशप, हाथ में ‘पार्कर’ का पेन लिए किसी कोने में बैठा उभरता हुआ लेखक, या फिर 'एम्बैसी' और 'क्वालिटी' जैसे पुराने रेस्तरां के बाहर कतार में खड़े खाने के शौकीन—यह सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जो आपको बार-बार यहाँ आने पर मजबूर कर देती है।
यहाँ की हर दुकान और हर नुक्कड़ की अपनी एक कहानी है। कोई यहाँ दशकों पुराने सिनेमाघरों में फिल्म देखने का मोह नहीं छोड़ पाता, तो किसी को यहाँ की सड़कों पर मिलने वाली मशहूर 'कोल्ड कॉफी' और 'भीगे कुल्चे' का स्वाद खींच लाता है। कनॉट प्लेस सिर्फ खरीदारी का केंद्र नहीं है, यह प्रेमियों के मिलने का ठिकाना है, पुराने दोस्तों की यादों का पिटारा है और उन तमाम अजनबियों के लिए एक घर जैसा अहसास है जो इस बड़े शहर में अपनी पहचान ढूँढने आए हैं। सच तो यह है कि दिल्ली बदलती रही, नए शहर बसते रहे, लेकिन जो बात CP की इन सफ़ेद दीवारों में है, वह किसी चमचमाते मॉल में कहाँ!


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